2002 के गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) से क्लीन चिट मिलने के खिलाफ दायर जाकिया जाफरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 26 नवंबर को सुनवाई करेगा। जस्टिस एएम खानविलकर की बेंच ने कहा कि इस मामले पर सुनवाई के लिए थोड़ा और वक्त चाहिए।
एसआईटी के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा- ये याचिका विचार योग्य नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को इस मामले में दूसरी याचिकाकर्ता नहीं बनाया जा सकता है। इस पर बेंच ने कहा- आपकी बात पर हम इस मामले की सुनवाई से पहले विचार करेंगे।
साबरमती ट्रेन के कोच में आगजनी के बाद भड़के थे दंगे
27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती ट्रेन के कोच में आग लगा दी गई थी। इसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। मारे गए ज्यादातर लोग अयोध्या से लौट रहे कारसेवक थे। इस घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क गए थे। इनमें करीब 1000 लोगों की जान चली गई थी।
गुलबर्ग सोसायटी में 69 लोगों की हत्या हुई
गोधराकांड के अगले दिन 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में दंगाइयों ने कांग्रेस सांसद जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या कर दी थी। घटना के बाद सोसायटी से 39 लोगों के शव मिले थे। बाकी 30 लोगों के शव नहीं मिलने पर 7 साल बाद उन्हें मृत मान लिया गया था। गुलबर्ग सोसायटी में 28 बंगले और 10 अपार्टमेंट हैं। गुजरात दंगों से जो इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, गुलबर्ग सोसायटी उनमें से एक थी। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी ने गुलबर्ग सोसायटी केस की दोबारा जांच की थी। एसआइटी ने इस मामले में 66 लोगों को गिरफ्तार किया था।
दंगों के वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे मोदी
जकिया जाफरी का आरोप है कि दंगा भड़कने के दौरान उनके पति वरिष्ठ नेताओं और पुलिस अफसरों को फोन करते रहे, लेकिन गुलबर्ग साेसायटी तक मदद नहीं पहुंची और दंगाइयों को रोका नहीं जा सका। दंगों के वक्त मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। एसआईटी ने 8 फरवरी 2012 को क्लोजर रिपोर्ट दायर की। इसमें नरेंद्र मोदी और अन्य अफसरों को क्लीन चिट दी गई। इसके खिलाफ जकिया जाफरी की याचिका को दिसंबर 2013 में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की कोर्ट और 2017 में गुजरात हाईकोर्ट ने ठुकरा दिया था।
Monday, November 19, 2018
Thursday, November 1, 2018
क्या नेपाल के पास है घरेलू हिंसा का समाधान?
एक अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भारी भीड़ है. इसी भीड़ में डॉक्टर प्रभात रिजाल को एक मरीज़ दिखी जिसके बदन पर छिलने और खरोंच के निशान थे.
उस महिला के आने की उम्मीद डॉक्टर प्रभात को पहले से थी. हम जिस अस्पताल का ज़िक्र कर रहे हैं, वो नेपाल के पश्चिमी इलाक़े में स्थित घोराही क़स्बे का क्षेत्रीय अस्पताल है.
डॉक्टर प्रभात और उनके साथी डॉक्टरों का साबक़ा हर रात ऐसे मरीज़ों से पड़ता है.
आम तौर पर ऐसे चोटिल मरीज़ शाम ढलने के बाद आते हैं. होता ये है कि इस वक़्त कई शराबी मर्द काम से लौटते हैं और शराब पीना शुरू करते हैं.
फिर वो अपनी बीवियों से मार-पीट करते हैं.
पतियों की हिंसा की शिकार महिलाएं अक्सर अपना पेट दबाए हुए आती हैं. कई बार उन्हें कान में दर्द की भी शिकायत होती है.
लेकिन अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें पहले इन महिलाओं के बदन पर चोट और खरोंच के निशान देखते हैं. इन्हीं से असल बात पता चलती है.
घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं
उस महिला को देखते ही डॉक्टर प्रभात रिजाल को लगा कि कुछ गड़बड़ है. उन्होंने महिला से पूछा कि क्या हुआ है? महिला अपने पति की पिटाई से बचने के लिए भागकर अस्पताल आई थी. वो अभी भी हांफ रही थी. उसके बाल पसीने से भीगे हुए थे.
रात के वक़्त अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड काफ़ी व्यस्त रहता है, तो डॉक्टर रिजाल एक नर्स के साथ उस महिला को एक प्राइवेट कमरे में ले गए. उन्होंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया.
इसके बाद उन्होंने महिला से बात कर के पूरा मामला समझा. उसे समझाया कि पति का मार-पीट करना सामान्य बात नहीं है. उसे ये हरकतें बर्दाश्त करने की ज़रूरत नहीं है.
कुछ देर बाद नर्स उसे पास ही स्थित एकद्वार संकट व्यवस्थापन केंद्र ले गई. ये वो जगह है जहां पर ऐसी घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद का पूरा इंतज़ाम है.
इन केंद्रों पर एक महिला पुलिस अधिकारी होती है और कुछ सलाहकार होते हैं. जो महिला को मानसिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों से उबरने में मदद करते हैं.
पति, लिव-इन पार्टनर या ब्वॉयफ्रैंड के हाथों हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं को सेहत से जुड़ी कई मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं. इसकी शुरुआत डॉक्टर के पास जाने से होती है.
कई बार यहां डॉक्टर वो परेशानियां न सिर्फ़ देख पाते हैं बल्कि उनसे निपटने में मदद भी करते हैं, जिनकी शिकार ये महिलाएं होती हैं.
बहुत से देशों में सरकारें अस्पतालों में ऐसी सुविधाएं देने से कतराते हैं. लेकिन, नेपाल ने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के लिए अस्पतालों में ही ऐसे केंद्र बनाए हैं, जो घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद करते हैं.
इन केंद्रों में ज़्यादातर महिलाओं को ही नियुक्त किया जाता है. जो इन महिलाओं की हर तरह से मदद करते हैं.
कितनी ख़तरनाक है घरेलू हिंसा
यूं तो कोई भी साथी के हाथों हिंसा का शिकार हो सकता है. पर, महिलाएं इसकी शिकार ज़्यादा होती हैं.
पूरी दुनिया में किसी भी रिश्ते में रही महिलाओं में से एक तिहाई यौन हिंसा या शारीरिक हिंसा की शिकार होती हैं.
किसी संघर्ष से गुज़र रहे देशों में ऐसी घटनाएं ज़्यादा देखी जाती हैं. जैसे कि कांगो और युगांडा जैसे हिंसक संघर्ष देख रहे देश. अभी भी एशिया, अफ्रीका और ओशियानिया के देशों में घरेलू हिंसा की घटनाएं बहुत होती हैं.
ऐसा नहीं है कि साथी के हाथों हिंसा की घटनाएं केवल विकासशील देशों में होती हों.
डेनमार्क में कुल आबादी की एक तिहाई महिलाएं जीवनसाथी के हाथों हिंसा झेल चुकी हैं.
ब्रिटेन में 30 फ़ीसद के क़रीब महिलाएं कम से कम एक बार अपने पार्टनर के हाथों हिंसा की शिकार हुईं. अमरीका में ये तादाद 32 प्रतिशत है. इनमें से 16 फ़ीसद ने तो यौन हिंसा को भी झेला है.
पार्टनर या जीवनसाथी के हाथों हिंसा की शिकार महिलाओं की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है.
अमरीका में क़रीबी साथी के हाथों हिंसा से बीस लाख से ज़्यादा चोट की घटनाएं होती हैं. यानी ये मोटापे और धूम्रपान से ज़्यादा गंभीर समस्या है.
पीड़ित महिलाओं को भयंकर दर्द, अस्थमा, नींद न आने, पेट ख़राब होने, डायबिटीज़ और यौन संक्रमण की शिकायतें होती देखी गई हैं.
उस महिला के आने की उम्मीद डॉक्टर प्रभात को पहले से थी. हम जिस अस्पताल का ज़िक्र कर रहे हैं, वो नेपाल के पश्चिमी इलाक़े में स्थित घोराही क़स्बे का क्षेत्रीय अस्पताल है.
डॉक्टर प्रभात और उनके साथी डॉक्टरों का साबक़ा हर रात ऐसे मरीज़ों से पड़ता है.
आम तौर पर ऐसे चोटिल मरीज़ शाम ढलने के बाद आते हैं. होता ये है कि इस वक़्त कई शराबी मर्द काम से लौटते हैं और शराब पीना शुरू करते हैं.
फिर वो अपनी बीवियों से मार-पीट करते हैं.
पतियों की हिंसा की शिकार महिलाएं अक्सर अपना पेट दबाए हुए आती हैं. कई बार उन्हें कान में दर्द की भी शिकायत होती है.
लेकिन अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें पहले इन महिलाओं के बदन पर चोट और खरोंच के निशान देखते हैं. इन्हीं से असल बात पता चलती है.
घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं
उस महिला को देखते ही डॉक्टर प्रभात रिजाल को लगा कि कुछ गड़बड़ है. उन्होंने महिला से पूछा कि क्या हुआ है? महिला अपने पति की पिटाई से बचने के लिए भागकर अस्पताल आई थी. वो अभी भी हांफ रही थी. उसके बाल पसीने से भीगे हुए थे.
रात के वक़्त अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड काफ़ी व्यस्त रहता है, तो डॉक्टर रिजाल एक नर्स के साथ उस महिला को एक प्राइवेट कमरे में ले गए. उन्होंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया.
इसके बाद उन्होंने महिला से बात कर के पूरा मामला समझा. उसे समझाया कि पति का मार-पीट करना सामान्य बात नहीं है. उसे ये हरकतें बर्दाश्त करने की ज़रूरत नहीं है.
कुछ देर बाद नर्स उसे पास ही स्थित एकद्वार संकट व्यवस्थापन केंद्र ले गई. ये वो जगह है जहां पर ऐसी घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद का पूरा इंतज़ाम है.
इन केंद्रों पर एक महिला पुलिस अधिकारी होती है और कुछ सलाहकार होते हैं. जो महिला को मानसिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों से उबरने में मदद करते हैं.
पति, लिव-इन पार्टनर या ब्वॉयफ्रैंड के हाथों हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं को सेहत से जुड़ी कई मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं. इसकी शुरुआत डॉक्टर के पास जाने से होती है.
कई बार यहां डॉक्टर वो परेशानियां न सिर्फ़ देख पाते हैं बल्कि उनसे निपटने में मदद भी करते हैं, जिनकी शिकार ये महिलाएं होती हैं.
बहुत से देशों में सरकारें अस्पतालों में ऐसी सुविधाएं देने से कतराते हैं. लेकिन, नेपाल ने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के लिए अस्पतालों में ही ऐसे केंद्र बनाए हैं, जो घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद करते हैं.
इन केंद्रों में ज़्यादातर महिलाओं को ही नियुक्त किया जाता है. जो इन महिलाओं की हर तरह से मदद करते हैं.
कितनी ख़तरनाक है घरेलू हिंसा
यूं तो कोई भी साथी के हाथों हिंसा का शिकार हो सकता है. पर, महिलाएं इसकी शिकार ज़्यादा होती हैं.
पूरी दुनिया में किसी भी रिश्ते में रही महिलाओं में से एक तिहाई यौन हिंसा या शारीरिक हिंसा की शिकार होती हैं.
किसी संघर्ष से गुज़र रहे देशों में ऐसी घटनाएं ज़्यादा देखी जाती हैं. जैसे कि कांगो और युगांडा जैसे हिंसक संघर्ष देख रहे देश. अभी भी एशिया, अफ्रीका और ओशियानिया के देशों में घरेलू हिंसा की घटनाएं बहुत होती हैं.
ऐसा नहीं है कि साथी के हाथों हिंसा की घटनाएं केवल विकासशील देशों में होती हों.
डेनमार्क में कुल आबादी की एक तिहाई महिलाएं जीवनसाथी के हाथों हिंसा झेल चुकी हैं.
ब्रिटेन में 30 फ़ीसद के क़रीब महिलाएं कम से कम एक बार अपने पार्टनर के हाथों हिंसा की शिकार हुईं. अमरीका में ये तादाद 32 प्रतिशत है. इनमें से 16 फ़ीसद ने तो यौन हिंसा को भी झेला है.
पार्टनर या जीवनसाथी के हाथों हिंसा की शिकार महिलाओं की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है.
अमरीका में क़रीबी साथी के हाथों हिंसा से बीस लाख से ज़्यादा चोट की घटनाएं होती हैं. यानी ये मोटापे और धूम्रपान से ज़्यादा गंभीर समस्या है.
पीड़ित महिलाओं को भयंकर दर्द, अस्थमा, नींद न आने, पेट ख़राब होने, डायबिटीज़ और यौन संक्रमण की शिकायतें होती देखी गई हैं.
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